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“महमूद अहमद”

अगर आपको काले स्याह बदल उमड़ते महसूस हो तो आपका मन अठखेलियाँ करने लगेगा। मन के न चाहने पर भी काले स्याह बदलो से टपकती बूंदो में भीगने को बेचैन हो जायेगा हैं। ऐसा क्यों होता हें? इसका आपको पता हैं।  

मैं बात यहाँ मौसम की नहीं मैं बात काले स्याह रंग की कर रहा हूँ। बोहोत हैं ऐसे कलाकार जो रंगीन चित्रकारी करते हैं। मगर आपको काले स्याह रंग के कलाकार की बात करे तो हम कुछ चुनिन्दा कलाकारों की बात करते हैं। उनमें से एक ऐसा नाम जो अपना मुकाम बुलन्द बना चुके हैं जिनके कागज़ पर कपडे पर आपको स्याह रंग की बानी वो तान देखने को मिलेगी जो उनकी तजुर्बे और मेहनत से खींची गई हैं। उनके द्वारा स्याह रंग के इस्तेमाल को देखने के मुरीद हम भी हैं। हमको इस कोरोना के समय में महमूद जनाब से मुलाकात करने का मौका मिला। उनके दिल्ही स्थित ललित कला के गढ़ी के छोटे से स्टूडियो में उनकी एक मजेदार टेबल / मेज़  हैं जिस पर रखा मेहमूद पेंटिंग किया करते हैं एक कुर्सी और आस पास पेंटिंग्स का अम्बार हैं. महमूद अहमद के साथी कलाकार कम ही स्टूडियो में दिखाई पड़ते हैं। तो मेहमूद जनाब का अपना एक परमानेंट ठिकाना बन गया। उनके हाथ का जादू अब भी कागज़ पर उकेरा जा रहा था जब हम उनके स्टूडियो में दाखिल हुए वो मशगूल थे काम में.  उनके पास कौन आकर खड़ा हो गया कुछ नहीं पता। हलकी आवाज़ में पचास के दशक के गाने बज रहे थे। हम सामने जाकर कुर्सी पर बैठ गए। महमूद का ख्याल मेरी और हुआ तो बहुत खुश हुए देख कर, काफी दिनों के बाद मुलाकात हुई हैं हमारी। कोरोना में मिलना ही नहीं हो रहा था। मैं बैठा उनसे कुछ सवाल करता मगर वो पहले ही कह बैठे ” देहलवी साहब में आर्टिस्ट हूँ आलोचक नहीं में शब्दों के साथ खेल नहीं सकता सीधा हूँ सीधा ही जवाब मिलेगा।”मैं मुस्कुराया और कहा ” महमूद जनाब में आपका इंटरव्यू लेने नहीं आया में आज आपने एक दोस्त के नाते आपका काम देखने आया हूँ मुझे आपका आर्टवर्क बेहद पसंद हैं आप स्याह रंग को जिस तरह इस्तेमाल करते हैं कागज़ भी गर्व मेहसूस करता होगा”मेहमूद साहब ने बातो ही बातो में चाय मंगा ली और पास रखे अपने ढेरो आर्ट वर्क से कुछ वर्क निकले और मुझे दिखाने लगे. मैं बड़ा वयाकुल था नए काम देखने को। पहला वर्क देखा जो यूँ था. जिसका सार हैं :-

चित्र १. आर्किटेक्टचरल ड्राइंग जिसमें चाँद नुमा बादल टीम टिमाते अपनी छटा बिखरने को वियाकुल हैं आर्किटेक्टचरल बिल्डिंग। एक झाकती मासूम सी लड़की सायद आर्किटेक्टचरल लेडी कहना जायदा सही होगा क्यूंकि जिसने आर्किटेक्टचरल बिल्डिंग की बनी लाइन की मनोहरता को अपने वाश में लिए बैठी हो। ड्राइंग की लाइन में खो जाने को मजबूर कर रही थी। लाइन का घुमावदार आकर देखते ही बनता था। स्याह रंग जो सफ़ेद कागज़ के रंग में समां गए हो। मेहमूद जनाब ने मानो स्याह रंग को अपने वश में कर रखा हो तान, लेय, शेडस, देखते ही बनते हैं। सफ़ेद और स्याह रंग का सही इस्तेमाल इनकी जिंदगी के उतार चढ़ाओ को दर्शा रही थी। मेरा मन जितना इस ड्राइंग को देखता उतना घेहराई में डूबता चला जाता। इतने में दूसरी ड्राइंग दिखाई और एक एक कर में ढेरो आर्ट वर्क देखता गया देखता गया और उसके स्याह रंग में डूबता चला गया मुझे कही भी इन ड्रॉइंग्स में अनेको रंगो की कमी मेहसूस कही दिखाई नहीं दी। अब इनकी बनावट के साथ इनके चुने सब्जेक्ट/विषय में डूबने की मेरी चाहत और बढ़ती जा रही थी। एक वर्क के बारे में आपको में और बताता चलूँ।

चित्र -२. वही स्याह रंग से बहार निकलती तस्वीर। ऊपर उडते परिंदे नुमा चाँद लिपटने को वियाकुल दिखाई पड़ते हैं। “तीन देविया” दर्शाती स्त्रीयो को देखते ही में इनकी बनावट में खो गया किस प्रकार लाइन से खेलते हुए महमूद जनाब ने इन तीन स्त्रीओँ को बना डाला जैसे वो खुद भी अनजान मालूम पड़ते हो। तीन देविया या मूर्तियां नाम दूँ में इस चित्र को. स्याह रंग को संभाल पाना आसान नहीं होता और बात जब कामुकता को दर्शन का हो या जीवन के उन पहलुओं को जिनका सम्बन्ध आपसे हो तो भीतर का कलाकार उफान मारता हैं और जो भी जगह मिले वही कुछ न कुछ बना देता हैं। इस चित्र को देख कर मेरे भीतर बैठा एक छोटा सा कलाकार उफान मारने लगा मुझे सोचने को मजबूर करने लगा किस तरह स्याह रंग को प्रयोग करके हम अपने भीतर के भाव को उकेर सकते हैं। कलाकार के भीतर बैठा एक और चंचल सा कलाकार होता हैं जो वो मेहसूस करता हैं वही बहार के कलाकार को रंगो से खेलने को मजबूर करता हैं। कलाकार उस भीतर बैठे कलाकार से नाराजगी मोल नहीं लेता। उसके विपरीत भी नहीं चल सकता। कलाकार के भीतर एक तरह का कामरस होता हैं जो उसके भीतर बैठे कलाकार को गहरा प्यार करता हैं। उसी से कलाकार के जीवन या जिंदगी के उतार चढ़ाओ आते हैं। सभी कलाकारो की रूह में रचा बसा होता हैं ये कामरस। धीरे से मेन ड्राइंग के ढेर में दबी एक ड्राइंग बहार निकली जिसकी रुपरेखा इस तरह हैं। बहार निकल मैं उस ड्राइंग को बोहोत देर तक निखरता रहा. एकाएक मेहमूद जनाब ने मुझसे पूछ ही लिया। “क्या हैं ऐसा इसमें जो आप इसको ड्राइंग के ढेर से निकल कर निहारते ही जा रहे हो” मैं शांत रहा क्यूंकि मैं अपने आईने को अपने सामने देख रहा था। इस ड्राइंग में इंसान का आईने से आमना सामना हो रहा था। उसके जीवन की कहानी आईने में सामने सामने आती जाती हैं। महमूद अहमद ने एक औरत के उलझे जीवन को बेखूबी दिखाने की कोशिश की हैं सिर्फ चंद लाइन में उसके अतीत भविष्ये और वर्तमान को उकेर कर रख दिया हैं। औरत अपने में एक पूरी उलझी हुई जिंदगी के साथ जीती हैं बचपन माँ बाप की शरण भविष्ये की चिंता शादी बच्चे और पति की खिदमत चाहिए किसी भी प्रकार से क्यों ही न करना पड़े। घर बार, माँ का रोल अदा करना बच्चो की परवरिश, शादी बुढ़ापे में बच्चो का प्यार मिलेगा भी के नहीं आदि में लिखता जाऊँ पर काम खत्म न हो पाएंगे औरत के। जितना ही सूंदर चित्रण किया हैं उतना इस ड्राइंग से सम्बन्ध बढ़ता जाता हैं। इस ड्राइंग में यही सब को शेड्स, लाइन, स्याह सफ़ेद का बेलेंस, सभी का सही और संतुलित समवेश किया हैं इस ड्राइंग/पेंटिंग में। जितना चाहो आप इन ड्राइंग की बात कर सकते हो जितना सोचा होता उससे कही ज्यादा इन ड्राइंग/पेंटिंग्स में दिखाई पड़ता हैं महमूद थक गए दिखाते दिखाते में देखता थका नहीं।

मैं आपको यहाँ थोड़ा महमूद अहमद के कला जगत के बारे में भी कुछ बताता चलु। जिनका नाम हिन्दुस्तान में ही नहीं दुनिआ के दूसरे मुल्को में भी। “महमूद अहमद” ने कला में स्नातक (BFA)1992 जामिआ इस्लामिआ दिल्ली से किया। उसके बाद जॉब में बिज़ी हो गए। मगर जॉब करते करते उनके अंदर का कलाकार बार बार हिचकोले मार रहा था घर की जरुरत पूरी करने को जॉब की। उसके साथ कुछ समय निकल कर पेंटिंग भी करते रहे। जब कुछ जॉब से फ़रीक़ हुए तो पेंटिंग्स को ही अपना पूरा समय दिया। समय आगे बड़ा तो सीनियर फेलोशिप भी प्राप्त की। भारत वर्ष में कई सौ चित्र पर्दशनी की हैं और अभी भी यही काम जारी हैं दुनिआ के कई देशो में रेज़ीडेन्सी प्रोग्राम में भाग लिया हैं। देश विदेश में सेकड़ो आर्ट कैंप किये हैं. महमूद अहमद की पेंटिंग्स का कलेक्शन दिनिया भर के आर्ट लवर्स के पास हैं आर्ट क्लेक्टरो के पास हैं महमूद की पेंटिंग्स मशहूर हस्तीओ के कमरे की शोभा बड़ा रही हैं। मेरी अब तीसरी चाय भी समाप्त हो चुकी थी। यहाँ से उठते समय मैं थोड़ा महमूद अहमद के जीवन यापन के बारे में भी कुछ बताता चलु। क्यूंकि उनके काम में उसका क्या संबंध रहा। आर्ट वर्क में क्या छाप छोड़ी। कला के शुरुआत महमूद ने स्कूल के लास्ट बेंच पर बैठ कर अपनी कल्पनाओ को उकेरा हैं। महमूद अपने स्कूल के लास्ट बेंचर इस लिए थे ताकि वो अपनी कला को समय दे सके। अपनी किताबो में अपनी कल्पनाओ के चित्र बांया करते थे। समय का पाहिया बीता जामिआ स्कूल के बराबर में कला स्नातक स्थान था जहा उनका मन लगा करता था। वही के बगीचे से तितली के अंडे ले जाकर घर ले कर जाना तितलिओं के निकलने पर उसके उड़ते हुए देखते तो खुशी का ठिकाना न रहता । उन्होंने उसी स्कूल से सटे कॉलेज में कला विभाग में दाखिला ले लिया। फिर चढ़ा महमूद पर कला का जादू। देखते देखते महमूद अहमद अब इस समय का एक नाम हैं महमूद अहमद को उनके काम की शैली से ज्यादा पहचाना जाता हैं। लेखक इज़हार आलम देहलवी writerdelhiwala.com

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