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SOORMA सुरमा बिना गॉड फादर के "

"सूRMA  सुरमा बिना गॉड फादर के "

"सूरमा" दिलजीत दोसाँद की बेहतरीन एक्टिंग, हॉकी के सब्जेक्ट पर "चक-दे-इंडिया" और सूरमा जैसी फिल्म बनी ओर कामयाब भी हुई. मगर मैं आज इन दो चलचित्र (मूवी) की आप से बात नहीं करने जा रहा हूँ। मैं आज हॉकी की अपनी प्रेम कथा और इस खेल के सूरमा की बात करने जा रहा हूँ जैसा संदीप सिंह के जीवन की घटनाओ से प्रेरित होकर, एक शानदार फिल्म बनाई गई हैं ।  



 मैं कल रात इस फिल्म को देख रहा था फिल्म में जैसे जैसे किरदार बनता जा रहा था उसके साथ होने वाली घटनाए भी बढ़ती जा रही थी. फिल्म के देखते देखते मुझे अपना अतीत या यु कहे मुझे अपने स्कूल टाइम के समय की हॉकी खेलने की कहानी फिल्म के द्रश्यो की माफिक आँखों के सामने बारी-बारी आती गई। अब आप पूछेंगे ऐसा क्या तीर मार लिए स्कूल में। और कोई न कोई खेल स्कूल में तो सभी खेलते हैं। मगर खेल तब खाश बन जाता हैं जब यमुना पार के टेंट वाले स्कूल हो। जिसमें सुविधाओं के नाम पर बस कपडे के टेंट और बैठने के लिए टाट और बड़ी क्लास के लिए टूटे डेक्स हो। इन स्कूलों में सभी खेल मुमकिन तो नहीं होते थे.और ९० के दशक में सभी का खेल खेलना न के बराबर था। बस खेले जो खेले जाते तो थे वो थे जैसे दौड़,खोखो,और रेसलिंग के कुछ खेल. जैसा स्कूल का PTI का खेल होता वैसा खेल/गेम छात्र (स्टूडेंट्स) खेला करते। 90 दशक के सरकारी स्कूल और वहा पढ़ने वाले सरकारी बच्चे, बेचारे (हसना नहीं यारो कभी आपको फिल्म फुकरे याद आ गई हो बिल कुल ऐसा ही हाल था उस ज़माने में ) सच में, मैं भी सरकारी स्कूल में ही पढ़ा हूँ। सरकारी स्कूल के टीचर खेतो से उठ कर सीधे स्कूल आ जाते थे। माफ़ी सभी नहीं लेकिन ज्यादा तर कियूं की यमुनापार की सिमा पच्छिम उप्र से लगी हुई हैं। तो ट्रेन का टाइम सभी टीचर्स को पता था टाइम होते ही धीरे धीरे टीचर गायब हो जाते शाम के पांच बजे के बाद तो चंद ही टीचर बचते।अच्छे टीचर पूरा टाइम रुकते। खेर सरकारी स्कूल में क्या होता था बाद में बात करेंगे। अभी तो हम हॉकी की बात कर रहें। हमारे एक फिज़िकल टीचर थे नाम था भाटिया सर ("कियूं जी" उनका एक लक़ब ) जब स्कूल टूर्नामेंट होते तो उस टाइम ३ से ज्यादा टीचर जिस खेल को करवाना पसंद करते उसी खेल को करवा दिया जाता था। ऐसे में हॉकी भी शामिल हो जाती। गेम करने की लिस्ट तो पूरी करनी थी। 


    "सुरमा" में हीरो "संदीप सिंह" काफी तकलीफो के बाद दुबारा वही मुकाम हासिल करने में कामयाब हो जाता हैं। जैसा चोट लगने से पहले का मुकाम था। मगर ये बात अलग हैं की वो एक लड़की के चक्कर में फिरकी नाम से दुनियाँ में मशहूर हो जाता।"फिरकी मैन" का किरदार आज तक हिन्दुस्तानी हॉकी की जान हैं। 


    हम अपना जूनून अपनी हॉकी स्कूल में ही छोड़ आये थे। हम भी कामयाब होते होते रह गए. हम भी आज हॉकी में कोई न कोई नया नाम कमा चुके होते। संदीप सिंह उर्फ़ फिरकी मैन की तरह। हमने कियूं हॉकी छोड़ी ये एक लम्बी कहानी हैं पर सुनानी छोटी करके हैं। पढ़ने वाले और सुनने वाले बोर हो जाते हैं लम्बी कहानीओ में। 

 तो हुआ यू के संदीप के खेतो वाले समय की तरह हमारा भी कोई उस्ताद नहीं था। थे तो हमारे चाचा जो ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में पढ़ते हुए हॉकी खेला करते थे. हमें उनकी हॉकी स्टिक के साथ उनके द्वारा हॉकी में रची कहनिओ ने ज्यादा प्रेरित किया।ना की स्कूल टीम के किसी सदस्य या टीचर्स ने। हमारा कोई मेंटोर नहीं बना था हमारे चाचा के अलावा। जब स्कूल की टीम बन रही थी तो हम भी खड़े हो गए उस लाइन में जहा हॉकी टीम का सलेक्शन हो रहा था। जहा सलेक्सन का एक नायब तरीका आजमाया जा रहा था , अगर ये तरीका भारतए टीम के लिए होता तो आज संदीप जैसे छोड़ पता नहीं कैसे कैसे खिलाडी होते। वो था जिसके पास हॉकी हैं वो टीम में। ऐसा कियूं था वो  सरकारी स्कूल के पास फंड नहीं तह होकय के लिए। तभी मुझे हमारे चाचा की हॉकी याद आई और उठा लाये स्कूल में, हो गया सलेक्सन। समय काम था टूर्नामेंट में बस एक हफ्ता ही बचा होगा दो तीन दिन स्कूल के बहार पार्क प्रेक्टिस की और सीधे भीड़ गए दूसरे स्कूल से। पता चला ये पिछले साल की चैम्पियन हैं। खेर मैच शुरू हुआ तब हमें पता चला हमारी टीम में भी कुछ अच्छे खिलाडी थे.हमने भी खूब पसीना बहाया पर गुल न कर पाए। मगर वो मैच हम जीत गए अब आप अंदाजा लगाइये इस बात का के हमसे हरने वाली टीम किसी होगी जो हमसे हार गई। आगे दांस्ता सुनिए। अगला मैच एक प्राइवेट स्कूल की टीम से होना था। जब मैदान में उस टीम को कपडे बदल कर उछाल कूद करते देखा तो हम देखते रह गए उनके पास पूरी ड्रेस थी (जो हॉकी की होती हैं) हममें कोई कोई चप्पल में कोई ब्लू स्टार के जूतों में तो कोई बल्लीमारान के सौ रुपए वाले जूते पहना था कुल मिला कर हम रंग बिरंगे कपड़ो के साथ रंग बिरंगे जूतो में थे. हम न ड्र्रेस में थे न किट में, बस थी तो अपनी पियारी हॉकी हम आधे मेन्टली हार मान चुके थे।  पर हिम्मत हमें आखिर तक नहीं हरी, अपनी आखरी साँस फूल जाने बाद भी हम खेलते हुए हार गए। में खेल के आखिरी पड़ाव में ही टकने में बॉल लगने की वझे से मैदान से हट गया था टीम हार गई। मुझे दुःख काम हुआ कियूं की में खेलता काम बैठा हुआ हारा था। इस हार ने हमे हमेशा के लिए हाररे हुए बना दिया था। वैसे मुझे और मेरे दोस्त (शरद ) को हॉकी का बुख़ार आसानी से नहीं उतरा था। इसी जदो जेहेद में हम पहुंच गए "ध्यानचन्द स्टेडियम" जहा गार्ड ने हमको अंदर नहीं जाने दिया बड़ी मुश्किल से कई दिनों के लगन के बाद हम स्टेडियम में प्रवेश कर पाए मगर वह कई घंटो की मथापच्ची कर के हमको कोच सर मिले। हम डरते हुए उनके पास जा कर बोले "सर हमको भी हॉकी सीखनी हैं क्या हम भी यहाँ आ सकते हे" उन्होंने सरकारी जाली वाली कुर्सी पर बैठे हुए हमको ऊपर से निचे तक ध्यान से देखा हम बड़े डर गए पता नहीं कियूं घूर रहें हममें  फिर भी डेट रहे देखते क्या जवाब मिलता हैं। कोच साहब ने हमें देखने के बाद कहा "बेटा कहा से खेले हो "- हमने एक दूसरे को देखा क्या कह रहे हैं सर " सर क्या मतलब"- मतलब कोनसी स्टेट से खेलते हो"- हम मुस्कुराये सर भी मुस्कुराये समझ गए, हमारे कहे बिना। सर हम तो इंटरस्कूल खेलते हैं" हमारे लिए यही बड़ी बात थी हम इंटर-स्कूल खेले थे. जिसकी वझे से अपने  कॉलर ऊपर करके चला करते थे। जो हॉकी की बात करते था उसको गर्व से बताते थे। बेटा यहाँ इंटर स्कूल वाले नहीं खेलते यहाँ स्टेट वाले हॉकी सीखते हैं"- हम ये सुन कुछ मायूस हो गए। सर ने हम को मायूस देखा तो बोले।"अच्छा ठीक हैं कल से आजाना पूरी किट में, मैं कल ही बताऊंगा तुम लोगो को यहाँ एड्मिसन देना हैं के नहीं पहले टेस्ट देना होगा ओके"। अब जाओ और खिलाड़िओ को खेलते हुए देखो और कल पूरी किट में आना"- ये सुन हम कभी खुश होते तो कभी उदास। बड़े परेशान हो गए क्या करे. हमने स्टेडियम के अंदर खिलाड़िओ को खेलते हुए देखा तो हम एक दूसरे को देख कर सोचने लगे. ये किट जो इन्होने पहनी हैं । ना तो हमारे पास हैं। ना ही खरीदने की हमारे घरवालों की ओकात हैं। जब हम कहेंगे तो हमारे घर वाले डंडा ले कर हमारी ओर दौड़े चले आएंगे। बस यही सोच हम दोनों को स्टेडियम से बहार ले आई. थोड़ी देर तो हम मायूस चलते रहे। लेकिन जब भूख लगी तो पांच रुपए के छोले बटुरो ने सब भुला दिया। एक-एक पत्ता छोले और साथ में तीन बठूरे हमारी मायूसी को ज्यादा देर हमरे भीतर न रख पाई और वो दिल और दिमाग से हॉकी को बहार ले आई। 

न तो घर का स्पोट न ही टीचर्स का स्पोट मिला नहीं तो क़सम से हम भी सूरमा होते सच में हकीकत में। 


ऐसा मेरे साथ नहीं इस देश के लाखो करोड़ो युवाओ के साथ रोज़ होता हैं घर वालो के पास रुपए नहीं होते और सरकार बिना गॉडफादर के सपोर्ट नहीं करती। ऐसी हज़रो कहानी हैं. यहाँ टीम में जगह तो छोड़. कोचिंग में ही अच्छे खिलाड़ी की जाती,धर्म। तो कोई बिना गाड़फाथेर के रह जाता हैं. अच्छे खिलाड़िओ का इस देश में रिक्सा चलाते,चाय बेचते मज़दूरी करते नज़र आएंगे। या बिना गॉड फादर के कोई छोटी मोटी नौकरी करते नज़र आएंगे। एक बार ऐसे मेले थैले में हाथ तो डालो पता नहीं कितने कोहिनूर मिलेंगे। जिनको आज भी गॉडफादरो की ज्यादा जरुरत हैं। 


एक बहका सा लेखक  

इज़हार आलम देहलवी 

WRITERDELHIWALA.COM   

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